Poetry

क्या पल था वो भी

क्या पल था वो भी,
वैसे तो हम दोनों चुप थे।
पर उन सितारों की मौसिक़ी में,
जैसे दिल की गुफ्तगू गूँज रही थी।

क्या पल था वो भी,
उस पल की भी कुछ सांसें थी।
जैसे आसमान में तुम्हारी ही तस्वीर बनी थी,
और ज़मीन पर तुम्हारा ही नाम लिखा था॥

क्या पुकारूँ उस पल को मैं?
क्या वो खूबसरत सी कोई नकाशी थी ?
इत्र की भीनी खुशबू थी या फिर,
खड़ा से कोई पाकीज़ा रिश्ता था वो ?