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अपनी पहचान

एक एक कदम बढ़ाके तू,
पार करले रेगिस्तान,
दुख-दर्द भुला कर तू,
बना ले अपनी पहचान ।

बगीचे का तू फूल नहीं,
पहाड़ों का नहीं तू वन,
बंजर ज़मीन से उठा है तू,
संघर्ष कर तू हर क्षण ।

नदियों मैं लहरें है आती,
बादल जब बरसाये पानी,
पर तू किसी की राह ना देख,
समुद्र जैसा बन सर्वशक्तिशाली ।

सामन्य न समझ तू खुदको,
श्रम कर और बन तू महान,
दुख-दर्द भुला कर तू,
बना ले अपनी पहचान ।

Poetry, Quill

तुम, चाँद और चंद राज़

सरकते हुए टूटी खिड़की के बाजू से 
तुझे लोरी गुनगुनाते हुए सुनने 
चाँदनी आ पहुँची

अंदर झुकी तो देखा 
तू आँखें मूँद गोद में लिए 
बचपन का सर सहला रही थी

गाल तेरे कुछ नम थे 
और खयालों में तेरे मिट्टी

राज़ सारे जान 
भाग पड़ा इस ओर यह चाँद 
पर बोल पड़े इससे पहले कुछ
सत-रंगी हो गया आसमान

ख़ैर झट्ट से तुमने भी छिपा लिया बचपन 
ओढ़ कर ज़रूरतों का दुपट्टा

नज़रें पलटकर देखा तो रोज़गार की रेल चल गयी
मिलेंगे आज रात फिर बोलकर चांदनी ढल गयी

Poetry, Quill

ख़ुशी

रौंगते कुचलते चले इन पत्तों को
किसी पर सपने पढ़ा
तो किसी पर लिखा था यादें
किसी ने सुना सिसकियों को
तो किसी ने छुई सीपियाँ

चलते हुए तरक्की की धुप में
जाने कहाँ से ‘क्यों’ का ख्याल आया
फुर्सत में बैठ, जज़्बे की छाँव में
खुदसे बात करें, फिर दिल में मलाल आया

मुस्कुराते हुए बैठे ज़मीन पर
तो देखा यहां भी पूरी दुनिया बसी थी
साला, तब जाने
लोग तो हर जगह ही उतने है
यह तो ख़ुशी है जिसकी कमी थी

Poetry, Quill

बैठ गया हूँ फिर…

बैठ गया हूँ फिर अपनी छोटी सी यह डायरी लेकर,
कानों में आवाज़ तेरी,
चेहरे पर मुस्कुराहट है,
एक हाथ में कलम और दूजे में तेरा हाथ है.

ख़ैर पता तो था घंटे भर की बात है सारी
आखिर कानों में आवाज़ है अब भी तेरी
चेहरे पर भी मुस्कुराहट है
एक हाथ में कलम पर दूजे में अब
सिर्फ तेरा एहसास है.

Poetry, Quill

मेरा घर

यह घर मेरा एक आम सी देहलीज़ है।
जिससे मैं रोज़ मुलाकात करती हूं॥
एक पार दसतूर और गुलामी है।
तो दूसरी पार मैं हूं और मेरी बातें॥

एक पार है जहाँ आईने में दिखती सूरत अपनी सी नहीं लगती।
एक पार है जहाँ हर ख़ुशी, हर परवाह में सिर्फ मेरा ही ज़िक्र है॥
दीवारों पे जैसे पुराने और मासूम किस्से
लिखें हैं जिसमें सिर्फ मेरा है ज़िक्र हैं॥

एक पार है, जहाँ प्यार की कोई कदर नहीं।
दूसरी पार है जहाँ प्यार भी है और कोई कदर नहीं॥

यह घर मेरा है दो जज़्बातों के बीच की देहलीज़,
जिससे मैं रोज़ मुलाकात करती हूं॥

Poetry

क्या पल था वो भी

क्या पल था वो भी,
वैसे तो हम दोनों चुप थे।
पर उन सितारों की मौसिक़ी में,
जैसे दिल की गुफ्तगू गूँज रही थी।

क्या पल था वो भी,
उस पल की भी कुछ सांसें थी।
जैसे आसमान में तुम्हारी ही तस्वीर बनी थी,
और ज़मीन पर तुम्हारा ही नाम लिखा था॥

क्या पुकारूँ उस पल को मैं?
क्या वो खूबसरत सी कोई नकाशी थी ?
इत्र की भीनी खुशबू थी या फिर,
खड़ा से कोई पाकीज़ा रिश्ता था वो ?

Poetry

क्यों ?

क्यों, इतनी आबादी तो है।
पर अंदर से तनहा हुईं मैं॥
क्यों सावन की बारिश तो है।
पर अंदर से सूखा हूं मैं॥
किसकी कमी है?
किसकी तालाश है?
खबर नहीं॥

देर से ही सही,
पर आज मन की सुनी है ।
कहता है खुशियों के लिबास में यह,
काँटों भरी ज़िन्दगी तूने खुद चुनी है ।

क्यों डरता है, क्यों रोता है ?
क्यों यह खूबसूरत पल खोता है ?
ज़मीन पर तो खाली रेट बिछी है।
असली हीरा तो तुझमें कहीं है॥

तू ही तेरी हिफाज़त है
तेरा हौंसला भी तू है।
तू ही तेरा मकसद है
तेरा चैन भी है तू ।
तू ही तेरा खुदा है, तेरी इबादत भी है तू॥

Poetry

मेरी राह…

मेरी राह कितनी बेवफा है तू।
तू ही मिटाती है उठाती भी है तू ॥
तेरा ना कोई आगाज़ हुआ ना कोई मंज़िल है तुझसे।
पर अपनी स्याही से यादों की पंक्तियाँ छोड़ जाती है तू ॥

वक़्त तेरी शमशीर है।
रफ़्तार तेरी नज़ाकत॥
फरेब की आग से भी तालीम की राख छोड़ जाती है तू ॥

इस चाँद की धुन से
इस सूरज की मस्ती से
मुझे तूने ही मिलाया है ॥

इस बारिश की जउबान से
इस बिजली की यलगार से
मुझे तूने ही मिलाया है ॥

इश्क़ की सादगी से।
दुनिया की तकल्लुफ तक॥
जिंदगी के कितने नकाब तूने हटाए।
ऐसे कितने रोज़ हैं तेरे पास बता ज़रा मैं बेसबर बहुत हुईं॥

तुझसे जिंदगी में कितना कुछ जान लिया।
पर तुझसे ही मैं अनजान हूं॥
महज अपने अल्फ़ाज़ों में ही।
तेरा वजूद ढून्ढ रही हूं मैं॥

Poetry

सुनो!

सुनो, कुछ बदला तो नहीं ?
वो आँखें और वो हसीं
वो कहानिया वो वादे जो जुमले थे सब,
लगता है मनो मुसव्विर ने तस्वीर में रंग तो भरा
पर स्याह की कलिक के सामने रंग कुछ फीका सा पद गया है अब

खौफ शायद इस बात का है तुम्हें की कहीं रिश्ते को नया नाम दे देने स रिश्ता बर्बाद न हो जाए
की कहीं तुम मुझसे और मैं तुमसे भागने के बहाने न ढूंढने लैगून,
की कहीं एक दूसरे पर अपनी परेशानियां न थोप दें
कहीं एक दूसरे को आगे बढ़ने से न रोक दें.

पर ये सोच भी कैसे लिया तुमने की मैं अपनी ज़िन्दगी की सबसे अज़ीज़ चीज़ को यूँ ही हाथों से फिसलने दूंगा,
कभी देखा है किसी शख्स को सिगर्रेट का पहला काश लेते ही धुंआ छोड़ते हुए
नहीं! वो पहला काश, वो पहला एहसा होता है ज़िन्दगी का
जिसमें वो पूरी ज़िन्दगी एक पल में ही जी लेता है
उसी सुरूर के नाम अपनी सांसें कर देता है, और फिर पूरी सिगरेट एक bar में पी लेता है!

तुम हाथ थम कर तो देखो एक बार,
थोड़ा आगे चलके पता चलेगा तुम्हें की आहिस्ता आहिस्ता परेशानियां ढल रही हैं,
ज़िन्दगी ज़िन्दगी से भी ज़्यादा हसीं लगने लगेगी,
वर्ना सांसें तो हमेशा से चल ही रही है !