Poetry, Quill

मेरा घर

यह घर मेरा एक आम सी देहलीज़ है।
जिससे मैं रोज़ मुलाकात करती हूं॥
एक पार दसतूर और गुलामी है।
तो दूसरी पार मैं हूं और मेरी बातें॥

एक पार है जहाँ आईने में दिखती सूरत अपनी सी नहीं लगती।
एक पार है जहाँ हर ख़ुशी, हर परवाह में सिर्फ मेरा ही ज़िक्र है॥
दीवारों पे जैसे पुराने और मासूम किस्से
लिखें हैं जिसमें सिर्फ मेरा है ज़िक्र हैं॥

एक पार है, जहाँ प्यार की कोई कदर नहीं।
दूसरी पार है जहाँ प्यार भी है और कोई कदर नहीं॥

यह घर मेरा है दो जज़्बातों के बीच की देहलीज़,
जिससे मैं रोज़ मुलाकात करती हूं॥