Special Features

सफ़र

मैं लहर बन झंकार सी गूंजती चली जा रही थी,और वो किनारा बन मेरे मुकाम का मेरा वहीं वक़्त बेव्क़्त इंतज़ार करता रहा।

मेरी खुशबू में भी उसकी अलग ही इज़्तिरार करती है बयां उन ख्वाइशों को,हमने सुना है सफर तय करते हैं वो भी जिनकी मंज़िलें तय नहीं होती हैं।

अफसोस, मुझे अपने ही तट के पास रहने का मौका नहीं मिलता,परन्तु मेरी उस तट से मोहब्बत नियति का कितना नायाब उदाहरण है कि बिना काँटों के गुलाब भी नहीं खिलता।क्या श्रिंगार किया है इस कायनात ने, बिना मेरे वो अधूरा है और बिना उसके मै!!

पर यह उल्फ़त इस कदर बयां होती है…..ना तो मुझे वो मिलता है और ना उसे मैं।

मुझे पता है कि तुम भी मुझे नहीं मिलने वाले,पर मै टेहरी लहर, खुदा की महर।

उठूँगी-गिरूँगी; कहर मचाऊंगी,तुझसे मिलकर ही रहूंगी।।कैसी कुर्बत रची है खुदा ने की तुम मुझे-मैं तुम्हेंसुकून देती हूँ। जब मैं हार मान बैठती हुँ; तुम मुझे सहलाते हो।

जब मैं उत्सुक होती हुँ; तुम ही शांति का दीदार भी कराते हो ।।

मुझे उन नैनों में अपना ठिकाना मिल जाता है,पर अकसर, मैनें लहरों को खाना- ए- बदोशियों की तरह फिरते देखा है

कितना गज़ब का बंधन है।एक पहलू हमारा मिलन निश्चित करता है, और दूसरा पहलू जुदाई का अलग ही सफरनामा बयां करता है।।

मैं लहर बन पूरा सफर सिर्फ तेरी एक झलक पाने के लिए तय करती हूँ,पर कभी तुझे एक कदम झुटला कर आगे बढ़ते नहीं देखा। जनाब! ये मोहब्बत है।

बिना किसी इंतज़ार के हर बार तेरे पुकारने से पहले उस ताबीर को तेरे समक्ष रख दिया।।जैसे एक परिंदे का आशियां फलक होता है,ठीक उसी प्रकार मेरी जन्नत तेरा किनारा है।

हर दफ़ा सिर्फ तू मेरा इंतेज़ार करता है, तब, जब उलझन में पड़ी मैं आसमान से जा मिलती हूँ ,और तब भी जब क्षितिज की लालिमा मुझ से बिखरती है।।

तुझे क्यों ऐसा प्रतीत होता है कि बारिश की महक मेरे लिए ज़्यादा म्ह्तव्पुर्ण है,जबकि तूझे मालूम है कि मैं सिर्फ तेरे लिए भागी दौड़ी चली आती हुँ।

मेरा चाहे कोई जितना मर्ज़ी रास्ता रोकना चाहे ,मैं तेरी ओर हर बार खिंची चली आती हुँ।।

और तू भी वहीं ठीक उसी जगह,मुसाफिर बन, खड़ा होता है।

पर अगर हम एक जगह टहर गए तो क़ायनात के तर्ज़ को ठुकरा देंगे,और फिर यह जहाँ भी उस तबाही से वाक़िफ़ हो जाएगा जिससे यह मेहरूम था।

तो इसलिए जैसा क्रम चल रहा है वैसे ही चलते रहने देते हैं,आज फिर एक बार दो तरफा मोहब्बत के पएमाने को मात देते हैं,जो दूसरे की मोहताज नहीं, वही तो एक तरफा मोहब्बत है, उसी तट के किनारे इंतज़ार करती हुँ मैं जहाँ से आता दिखता तेरा खत्त है।

सिर्फ तू मेरे फितूर से वाक़िफ़ है, कि मै तेरी लहर असल में कैसे बातें करती हुँ,खुल के ज़माने से छुप के सिर्फ तेरा ही ज़िक्र अपनी रूहानियत से करती हुँ।

मैं ज़माने के सामने चाहे लडूं, मुस्कुराऊं ,भागुं या चाहे मुहँ फेर लूँ,पर तेरे अन्दर लीन होकर उस जुनून में बहकर फिर उस क़फस में क़ैद हो जाना भी एक रिवायत सी बन गयी है!!