Poetry, Quill

ख़ुशी

रौंगते कुचलते चले इन पत्तों को
किसी पर सपने पढ़ा
तो किसी पर लिखा था यादें
किसी ने सुना सिसकियों को
तो किसी ने छुई सीपियाँ

चलते हुए तरक्की की धुप में
जाने कहाँ से ‘क्यों’ का ख्याल आया
फुर्सत में बैठ, जज़्बे की छाँव में
खुदसे बात करें, फिर दिल में मलाल आया

मुस्कुराते हुए बैठे ज़मीन पर
तो देखा यहां भी पूरी दुनिया बसी थी
साला, तब जाने
लोग तो हर जगह ही उतने है
यह तो ख़ुशी है जिसकी कमी थी

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