Poetry

सुनो!

सुनो, कुछ बदला तो नहीं ?
वो आँखें और वो हसीं
वो कहानिया वो वादे जो जुमले थे सब,
लगता है मनो मुसव्विर ने तस्वीर में रंग तो भरा
पर स्याह की कलिक के सामने रंग कुछ फीका सा पद गया है अब

खौफ शायद इस बात का है तुम्हें की कहीं रिश्ते को नया नाम दे देने स रिश्ता बर्बाद न हो जाए
की कहीं तुम मुझसे और मैं तुमसे भागने के बहाने न ढूंढने लैगून,
की कहीं एक दूसरे पर अपनी परेशानियां न थोप दें
कहीं एक दूसरे को आगे बढ़ने से न रोक दें.

पर ये सोच भी कैसे लिया तुमने की मैं अपनी ज़िन्दगी की सबसे अज़ीज़ चीज़ को यूँ ही हाथों से फिसलने दूंगा,
कभी देखा है किसी शख्स को सिगर्रेट का पहला काश लेते ही धुंआ छोड़ते हुए
नहीं! वो पहला काश, वो पहला एहसा होता है ज़िन्दगी का
जिसमें वो पूरी ज़िन्दगी एक पल में ही जी लेता है
उसी सुरूर के नाम अपनी सांसें कर देता है, और फिर पूरी सिगरेट एक bar में पी लेता है!

तुम हाथ थम कर तो देखो एक बार,
थोड़ा आगे चलके पता चलेगा तुम्हें की आहिस्ता आहिस्ता परेशानियां ढल रही हैं,
ज़िन्दगी ज़िन्दगी से भी ज़्यादा हसीं लगने लगेगी,
वर्ना सांसें तो हमेशा से चल ही रही है !

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