Poetry

मेरी राह…

मेरी राह कितनी बेवफा है तू।
तू ही मिटाती है उठाती भी है तू ॥
तेरा ना कोई आगाज़ हुआ ना कोई मंज़िल है तुझसे।
पर अपनी स्याही से यादों की पंक्तियाँ छोड़ जाती है तू ॥

वक़्त तेरी शमशीर है।
रफ़्तार तेरी नज़ाकत॥
फरेब की आग से भी तालीम की राख छोड़ जाती है तू ॥

इस चाँद की धुन से
इस सूरज की मस्ती से
मुझे तूने ही मिलाया है ॥

इस बारिश की जउबान से
इस बिजली की यलगार से
मुझे तूने ही मिलाया है ॥

इश्क़ की सादगी से।
दुनिया की तकल्लुफ तक॥
जिंदगी के कितने नकाब तूने हटाए।
ऐसे कितने रोज़ हैं तेरे पास बता ज़रा मैं बेसबर बहुत हुईं॥

तुझसे जिंदगी में कितना कुछ जान लिया।
पर तुझसे ही मैं अनजान हूं॥
महज अपने अल्फ़ाज़ों में ही।
तेरा वजूद ढून्ढ रही हूं मैं॥

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