Poetry, Quill

चला हूँ खोजने आज

चला हूँ खोजने खुदको आज,
वहाँ जहाँ, गिरना सीखा था।
चला हूँ खोजने खुदको आज,
वहाँ जहाँ, हस्ते हुए फिसलना सीखा था।

जाने कब उठ खड़े होने की दौर में,
गिरने की एहमियत भूल गया।
जाने कब हस्ते हुए इक दूजे पर,
मुस्कुराना भूल गया।

चला हूँ जानने आज,
कब यह मान अभिमान बन गया।
चला हूँ जानने आज,
कब सियाह भी शौंक बन गया।

कभी न रुको सुन सोच कर,
मैं भी यह दौड़ दौड़ने लगा।
थका हारा अब बैठकर,
साँस लेने की कीमत सोचने लगा।

चला हूँ खोजने आज,
कब चलते चलते जीना भूल गया ।
चला हूँ खोजने आज,
कब मैं में मैं डूब गया।

2 thoughts on “चला हूँ खोजने आज”

  1. Inder says:

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      Thank you so much for your kind words.

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