Poetry

घर

अजीब शहर है ,
सारे भाग रहे रफ्तार मे
पर कैद हैं कहीं न कहीं ,
वैसे तो पास हैं
पर दिल कहीं औऱ ही है ,
करने को तो दो बातें है
पर समय किसी के पास नहीं ,
सामने तो सब दोस्त हैं
पर पीछे खंजर छुपाए हैं सबने ,
मुखौटे है कई सारे
असलियत खुद को भी पता नहीं ,
अजीब कशमकश है
प्यार से ज्यादा डर है अंदर ,
सर पर छत तो है
पर घर कहीं नहीं ,

तो बस , आज चल पड़ी हूँ पहाड़ो की ओर ,
कहने को तो बस पहाड़ हैं
पर सुकून बसता है मेरा वहां ,
वादियाँ तो बस नाम की हैं
घर है मेरा वहाँ ।

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