Poetry

क्यों ?

क्यों, इतनी आबादी तो है।
पर अंदर से तनहा हुईं मैं॥
क्यों सावन की बारिश तो है।
पर अंदर से सूखा हूं मैं॥
किसकी कमी है?
किसकी तालाश है?
खबर नहीं॥

देर से ही सही,
पर आज मन की सुनी है ।
कहता है खुशियों के लिबास में यह,
काँटों भरी ज़िन्दगी तूने खुद चुनी है ।

क्यों डरता है, क्यों रोता है ?
क्यों यह खूबसूरत पल खोता है ?
ज़मीन पर तो खाली रेट बिछी है।
असली हीरा तो तुझमें कहीं है॥

तू ही तेरी हिफाज़त है
तेरा हौंसला भी तू है।
तू ही तेरा मकसद है
तेरा चैन भी है तू ।
तू ही तेरा खुदा है, तेरी इबादत भी है तू॥

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